चांद, रात और नींद

इस रात के सूने आंचल में
सहर सोई लगती है
हर चीज मुझे अपनी ही क्यों
अपने से पराई लगती है...

2.

किसी से उधार मांग कर लाई थी
जिंदगी
वो भी किसी के पास गिरवी रख दी.

3.
नींद नहीं आ रही...
कौन है
जो इतनी रात गए
मेरे लिए जाग रहा है...

4.
जब पूरे अमावस की रात
तुम्हे पागलो की तरह
ढूंढ रही थी
उस रात
तुम कहां थे चांद ???????

19 टिप्पणियाँ:

खुशदीप सहगल 16 अप्रैल 2011 को 7:20 am  

खो गया है मेरा चांद,
ढूंढता हूं मैं मेरा चांद,
खो गया है, खो गया है मेरा चांद...

जय हिंद...

संजय भास्कर 16 अप्रैल 2011 को 7:58 am  

हिन्दी ब्लॉगजगत के स्नेही परिवार में इस नये ब्लॉग का और आपका मैं संजय भास्कर हार्दिक स्वागत करता हूँ.

शिवम् मिश्रा 16 अप्रैल 2011 को 8:11 am  

यहाँ आना सार्थक रहा ... शुभकामनाएं !

Udan Tashtari 16 अप्रैल 2011 को 8:30 am  

जब पूरे अमावस की रात
तुम्हे पागलो की तरह
ढूंढ रही थी
उस रात
तुम कहां थे चांद ???????


-अह्हआआअ.....वाह!!

Poorviya 16 अप्रैल 2011 को 9:17 am  

उस रात
तुम कहां थे चांद ???????

jai baba banaras...

प्रवीण पाण्डेय 16 अप्रैल 2011 को 9:51 am  

बड़ी सुन्दर अभिव्यक्तियाँ।

Arvind Mishra 16 अप्रैल 2011 को 9:52 am  

ये क्षणिकाएं ऐसी कि अनंत काल की संवेदना को जैसे अपने में समेट लें !

Rakesh Kumar 16 अप्रैल 2011 को 10:47 am  

उफ़! आपका यह दीवानापन
अमावस की रात में भी चाँद को ढूँढना
उधार की जिंदगी भी गिरवी रख दी.

Pratik Maheshwari 16 अप्रैल 2011 को 11:21 am  

किसी से उधार मांग कर लाई थी
जिंदगी
वो भी किसी के पास गिरवी रख दी.

क्या बेहतरीन पंक्तियाँ लिखीं हैं... वाह!

तीन साल ब्लॉगिंग के पर आपके विचार का इंतज़ार है..
आभार

संगीता स्वरुप ( गीत ) 16 अप्रैल 2011 को 11:29 am  

हर क्षणिका बहुत खूबसूरत ...खुशदीप जी का शुक्रिया जो उन्होंने यहाँ का पता बताया

honesty project democracy 16 अप्रैल 2011 को 6:28 pm  

असीमा भट्ट जी मैं भी एक पागल ही हूँ और आप जैसे पागल से खुशदीप जी मदद से मिल पाया हूँ ..इसलिए खुशदीप जी का सबसे पहले धन्यवाद....इस पागलपन को बनाये रखिये क्योकि ये पागलपन इंसानी संवेदना को बचाने का प्रयास कर रही है जिससे भ्रष्ट नेताओं के द्वारा देश बेचने तथा धनपशु उद्योगपतियों का देश व समाज का खून पिने के पागलपन के प्रभाव को कम करने में मदद मिलेगी...

सुशील बाकलीवाल 16 अप्रैल 2011 को 9:09 pm  

चांद है गुम और रात जवां, नींद किसे फिर होश कहाँ...

मीनाक्षी 17 अप्रैल 2011 को 1:19 am  

"मुझे ये पगली शब्द बहुत पसंद है..कुछ कुछ दीवानी सी."आपका परिचय ही दीवाना कर गया... :)

mahendra verma 17 अप्रैल 2011 को 7:03 am  

आपकी संवेदनशीलता आपकी कविताओं में झलक रही है। यही संवेदना इंसान को इंसान बनाए रखने में मदद करती है।

udaya veer singh 17 अप्रैल 2011 को 6:14 pm  

bhasha ki bhasha, aur rachana ki paribhasha , agar manobhavon ko jodati ho ,vah sarthak manohari kavy hai . thode shabdon ka bada prayan .
sadhuvad

monali 18 अप्रैल 2011 को 9:10 am  

Welcome to the blog world... i guess i m lucky to find dis lovely blog.. plsss keep writing coz m gettin da intuition dat i shall learn a lot frm u :)

बाबुषा 18 अप्रैल 2011 को 10:25 am  

असीमा, बहुत प्यार !

ये दुनिया तुझे जीने न देगी और तेरा खुदा तुझे मरने न देगा ! तू ही मीरा है ,तू ही लल्ला और तू ही राबिया ! सलाम तेरे पागलपन को !

Hindi Choti 31 मई 2015 को 7:12 am  


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मैं कौन हूं ? इस सवाल की तलाश में तो बड़े-बड़े भटकते फिरे हैं, फिर चाहे वो बुल्लेशाह हों-“बुल्ला कि जाना मैं कौन..” या गालिब हों- “डुबोया मुझको होने ने, ना होता मैं तो क्या होता..”, सो इसी तलाश-ओ-ताज्जुस में खो गई हूं मैं- “जो मैं हूं तो क्या हूं, जो नहीं हूं तो क्या हूं मैं...” मुझे सचमुच नहीं पता कि मैं क्या हूं ! बड़ी शिद्दत से यह जानने की कोशिश कर रही हूं. कौन जाने, कभी जान भी पाउं या नहीं ! वैसे कभी-कभी लगता है मैं मीर, ग़ालिब और फैज की माशूका हूं तो कभी लगता है कि निजामुद्दीन औलिया और अमीर खुसरो की सुहागन हूं....हो सकता कि आपको ये लगे कि पागल हूं मैं. अपने होश में नहीं हूं. लेकिन सच कहूं ? मुझे ये पगली शब्द बहुत पसंद है…कुछ कुछ दीवानी सी. वो कहते हैं न- “तुने दीवाना बनाया तो मैं दीवाना बना, अब मुझे होश की दुनिया में तमाशा न बना…”

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