आवारा शाखों पर
कल रात भर
चांदनी से
शबनम कुछ यूं गिरी
कि
भोर गीली थी...
2.
शाम के धुंधलके में
हम तुम जो साथ चल रहे हैं
इक दूसरे का हाथ, हाथ में लिए
सुनसान राहों पर
मैं देखती हूं सूरज को तुम्हारी आंखों में ढलते हुए
मैं इसे अपनी आंखो में समा कर रखूंगी रातभर
सपनों की तरह
सुबह फिर से निकलेगा यह सूरज
हम फिर निकल पड़ेंगे
इक कभी ना खत्म होने वाली
लंबी और नई राह पर
साथ-साथ चलने के लिए...

