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मेरी कविताएं




आवारा शाखों पर
कल रात भर
चांदनी से
शबनम कुछ यूं गिरी
कि
भोर गीली थी...

2.
शाम के धुंधलके में
हम तुम जो साथ चल रहे हैं
इक दूसरे का हाथ, हाथ में लिए
सुनसान राहों पर
मैं देखती हूं सूरज को तुम्हारी आंखों में ढलते हुए
मैं इसे अपनी आंखो में समा कर रखूंगी रातभर
सपनों की तरह
सुबह फिर से निकलेगा यह सूरज
हम फिर निकल पड़ेंगे
इक कभी ना खत्म होने वाली
लंबी और नई राह पर
साथ-साथ चलने के लिए...

मेरे बारे में

मेरी फ़ोटो
मैं कौन हूं ? इस सवाल की तलाश में तो बड़े-बड़े भटकते फिरे हैं, फिर चाहे वो बुल्लेशाह हों-“बुल्ला कि जाना मैं कौन..” या गालिब हों- “डुबोया मुझको होने ने, ना होता मैं तो क्या होता..”, सो इसी तलाश-ओ-ताज्जुस में खो गई हूं मैं- “जो मैं हूं तो क्या हूं, जो नहीं हूं तो क्या हूं मैं...” मुझे सचमुच नहीं पता कि मैं क्या हूं ! बड़ी शिद्दत से यह जानने की कोशिश कर रही हूं. कौन जाने, कभी जान भी पाउं या नहीं ! वैसे कभी-कभी लगता है मैं मीर, ग़ालिब और फैज की माशूका हूं तो कभी लगता है कि निजामुद्दीन औलिया और अमीर खुसरो की सुहागन हूं....हो सकता कि आपको ये लगे कि पागल हूं मैं. अपने होश में नहीं हूं. लेकिन सच कहूं ? मुझे ये पगली शब्द बहुत पसंद है…कुछ कुछ दीवानी सी. वो कहते हैं न- “तुने दीवाना बनाया तो मैं दीवाना बना, अब मुझे होश की दुनिया में तमाशा न बना…”

वक्त की नब्ज

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