अमृता का खत पढते हुए खुद प्रेम-पत्र हो जाना है

असीमा

अमृता-इमरोज के प्रेम पत्र पढ रही हूं। इमरोज ने खुद संपादित की है। अमृता के बाद वो उनके खत के जरिए अपने आस-पास महसूस करते हैं। बहुत खूबसूरत अहसास है उन्हें पढना...

क्या था उन दोनों में जो एक दूसरे के इतने कायल थे, मुरीद थे। कहां से आते हैं एसे इनसान और कहां चले जाते हैं...
पढती हूं और रोती हूं...वो खुशी के आंसू हैं या गम के मालूम ही नहीं पड़ता...शायद दोनो मिक्स।
पर कमाल है। एक जगह अमृता लिखती हैं--मेरे अच्छे जीते..मेरे कहने से मेरे कमरे में और रेडियोग्राम पर एसडी वर्मन को सुनना..
सुन मेरे बंधु रे...
सुन मेरे मितवा
सुन मेरे साथी रे...।
और मुझे बताना वो लोग कैसे होते हैं जिन्हें कोई इस तरह आवाज देता है...
आह,,,,अमृता और इमरोज ने मेरे प्यार की प्यास को और बढा दिया। पर ये वो लोग क्या समझेंगे जो जेब में कंडोम लेकर घूमते हैं। उन्हें तो ये भी नहीं पता(शायद) कि अमृता और इमरोज कौन हैं. कहां हैं... 

14 टिप्पणियाँ:

बाबुषा 24 अप्रैल 2011 को 12:02 am  

सच कहा असीमा !

मैंने लिखा भी है कहीं - जिस्म से ज्यादा खतरनाक है रूह का पिघलना !

अद्भुत इमरोज़ और अद्भुत अमृता ....इमरोज़ की पीठ में 'साहिर -साहिर ' लिखती रहतीं थीं..और इमरोज़ उनके प्रेम में पागल ! अद्भुत !

प्रवीण पाण्डेय 24 अप्रैल 2011 को 12:48 am  

रूह पिघले बिना खालिस सोना नहीं बनेगा।

vandan gupta 24 अप्रैल 2011 को 3:13 am  

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (25-4-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

http://charchamanch.blogspot.com/

Khushdeep Sehgal 24 अप्रैल 2011 को 4:31 am  

सिर्फ अहसास है ये, रूह से महसूस करो,
प्यार को प्यार ही रहने दो, कोई नाम न दो...

जय हिंद...

Rakesh Kumar 24 अप्रैल 2011 को 5:06 am  

रूह की बातें बस रूह ही अहसास कर सकती है.

Dr (Miss) Sharad Singh 24 अप्रैल 2011 को 9:42 am  

सचमुच, अमृता-इमरोज का प्रेम अद्वितीय था...अद्भुत था...
उनके भावपूर्ण स्मरण के लिए आभार...

वाणी गीत 24 अप्रैल 2011 को 7:17 pm  

क्या बात कही ...उन्हें जानने के लिए रूह की पाकीज़गी जरुरी है !

Kailash Sharma 25 अप्रैल 2011 को 7:09 am  

प्रेम की पवित्रता ही इस प्रेम की रूह है..

अनामिका की सदायें ...... 25 अप्रैल 2011 को 8:58 am  

sunder.

दीपशिखा वर्मा / DEEPSHIKHA VERMA 25 अप्रैल 2011 को 9:25 am  

वो भी एक दास्ताँ थी, जो सदा सादा रूहों को महकाती रहेगी. आपके विचारों को सलाम. बहुत खूब!

Pratik Maheshwari 20 मई 2011 को 11:25 am  

ये पत्र किस पुस्तक में पढ़े जा सकते हैं? बताएं...

Richa P Madhwani 31 मई 2011 को 5:53 am  

http://shayaridays.blogspot.com

Unknown 31 मई 2015 को 7:12 am  


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मैं कौन हूं ? इस सवाल की तलाश में तो बड़े-बड़े भटकते फिरे हैं, फिर चाहे वो बुल्लेशाह हों-“बुल्ला कि जाना मैं कौन..” या गालिब हों- “डुबोया मुझको होने ने, ना होता मैं तो क्या होता..”, सो इसी तलाश-ओ-ताज्जुस में खो गई हूं मैं- “जो मैं हूं तो क्या हूं, जो नहीं हूं तो क्या हूं मैं...” मुझे सचमुच नहीं पता कि मैं क्या हूं ! बड़ी शिद्दत से यह जानने की कोशिश कर रही हूं. कौन जाने, कभी जान भी पाउं या नहीं ! वैसे कभी-कभी लगता है मैं मीर, ग़ालिब और फैज की माशूका हूं तो कभी लगता है कि निजामुद्दीन औलिया और अमीर खुसरो की सुहागन हूं....हो सकता कि आपको ये लगे कि पागल हूं मैं. अपने होश में नहीं हूं. लेकिन सच कहूं ? मुझे ये पगली शब्द बहुत पसंद है…कुछ कुछ दीवानी सी. वो कहते हैं न- “तुने दीवाना बनाया तो मैं दीवाना बना, अब मुझे होश की दुनिया में तमाशा न बना…”

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